मानवता : एक ह्रासप्राय धरोहर
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। अच्छे-बुरे समाजिक संस्कारों का मानव स्वयं ही रचयिता, पूरक व भोगी भी होता है। नीति निर्धारण से लेकर कालजयी परम्पराओं तक, हारों के चिरपरिचित भावों से विश्वविजय की संकल्पनाओं तक, हर एक कार्य के आरम्भ से लेकर उनकी पूर्ति तक, मानव सिर्फ मानव का ही नही वरन् समस्त चराचर का अध्ययन कर लेता है। कभी विचारों की उत्कृष्टता का प्रमाण वह जैव-अभ्यारण बनाकर देता है तो कभी अपनी कुटिलता, शिकार को मनोरंजन बनाकर प्रदर्शित करने में करता है। छोटे से भी छोटा काम बड़ी बुद्धिमानी के साथ, साख को ध्यान में रखकर करता है। मृगतृष्णा तो अजेय है इसकी। आपसी सहचर्य को भी बंधनों में बाँधकर रखने की चेष्टा काफी हद की है इसने। आज जबकि समस्त लोक में इससे उत्कृष्ट कोई जीव नहीं, तो भी यह अपनी मर्यादा की सीमारेखा खींचने में असमर्थ ही है। हर एक कार्य़ कर लेने की होड़ में जीवन समर हो चुका है। अपने-पराये जो स्वयं इसके परिभाषी हुआ करते थे आज बाधक हैं। बाधक हैं उनसे आगे की सोच रखने में, अपने मुख्य धर्म मानवता के सृजन, पालन, संवहन में साथ ही साथ परिचायक में भी। मानवता, सर्वधर्म समभाव, आत...
