भारत एवं जीवन के मूल्य
भारत एक लोकतांत्रिक, प्रभुतासम्पन्न गणराज्य के रूप में समस्त विश्वपटल पर एकमात्र ऐसा उदाहरण है जो अपने साथ साथ अन्य राष्ट्रों के मौलिक, वैचारिक भावनाओं का यथासम्भव उचित सम्मान एवं निरपेक्ष भावसंज्ञाओं का आदर करता है।
हमारे देश की सदा से वसुधैवकुटुम्बकम की मनोस्थिति, लाभ से ज्यादा हानिप्रद ही रही है। आदिकाल के इतिहास से लेकर मुगलकाल या ब्रिटिश साम्राज्य या फिर आज की वैश्विक सत्तापरक विचारधारा हमने केवल घाटे का सौदा किया है। संदेश देने में हम कदाचित सफल रहे परन्तु समभाव हमें ऊर्जावान के साथ साथ एक ऐसी ऊँचाई प्रदान करता है जो औपनिवेशिक प्रवृत्तियों के समस्त चंडाल चौकड़ी का सामना करने में समर्थ रहा है।
बात ज्ञान-विज्ञान की करें या आध्यात्मिकता की समस्त संसार को हमने जीवन-मूल्य, अपनी बलि देकर समझाय़ी है। सनातन धर्म पुरातन एवं अनुभवसम्पन्न होने कारण समस्त धर्मों का मूल है और समस्त सिद्धांतों को समावेशित करने के साथ साथ सार्वभौमिक स्वीकार्यता एवं सहनशीलता को प्रमाणिक स्वरूप प्रदान करता है।
विगत कई दशकों से देश की स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन विकास के साथ साथ हमारी अधोगति की स्पष्ट दुर्दशा को प्रतिबिंबित करते हैं। जहाँ एक समय किसी भी व्यक्ति की अकाल या स्वाभाविक स्वर्गवास हो जाने पर समस्त मानव समुदाय सहानुभूति प्रकट करने इकट्ठा हो जाया करते थे उसी मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानने वाले समुदाय में आज भयंकर हृदय को झकझोर देने वाली घटनायें खुलेआम घट रहीं हैं और हम रोजमर्रा के काम में यूँ मशगूल हैं जैसी हमारी कोई जवाबदेही नहीं। ऐसे हृदयविदारक क्षण में मुझे दिनकर जी पंक्तियाँ याद आती हैं
“समर शेष है, नहीं पाप भागी केवल ब्याध।
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।।”
यदि एक क्षण को सबकुछ भुलाकर हम विकासोन्मुख होकर दुनिया की गन्दी राजनीति को उनकी भावसाधना का विकल्प भी मान लें तो भी किसी सूरत में हमारे अपराध क्षम्य नहीं।
माना की एकजुटता एक आवश्यकता नहीं सिद्धांत है लोकजनशक्ति के प्रतिपादन का, परन्तु किन शर्तों पर हमें परिभाषित करना ही होगा, नहीं तो कुछ नासमझ अल्पकाल तक हमें क्षीण करके हमें हमेशा के लिए एक सोचनीय अवस्था में छोड़कर एक नराधम इतिहास की नींव डालकर सबसे बड़े धर्म मानवता को ताक पर रखकर आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा भारत देंगे जिसपर पूर्वजों को रोना आयेगा।
अब हमें मान ही लेना चाहिये कि समता के सारे प्रयत्न जो विगत वर्षों से संघीय शासन पद्धति को जीवंत बनाने हेतु हो रहे, कहीं ना कहीं तो चूक है। जिस भारत का सपना हमारे आदर्शों ने देखा था यदि हम उसका पुनर्विश्लेषण करें तो अपने आप को कटघरे में खड़ा पायेंगे। “समस्त दुःखों एवं सुखों के जनक, पोषक, पालक एवं भोक्ता तुम स्वयं हो” स्वामी विवेकानन्द जी के कथन को भूलना नहीं चाहिये। भारत जागेगा, विश्वगुरू बनेगा इसमें कोई दो राय नहीं परन्तु उससे पूर्व हमें अंकुश लगाना होगा उन ताकतों पर जो तन से भारतीय परन्तु मन से विरोधी हैं। जिनमें सत्तालोभ है वो कभी जनहितकारी हो ही नहीं सकता... एकमत होना आवश्यक नहीं परन्तु सम्पूर्ण उद्देश्यों का एकभाव होना चाहिये।
परिवर्तन जरूरी है, भारत जाग रहा बस गतिशीलता आवश्यक है, हम सक्षम हैं बस आत्मावलोकन व आत्मविश्लेषण की आवश्यकता है। इंडिया – भारत जल्द ही एकरूप होंगे। हम भविष्य के कर्णधार हैं, हमारी मौलिकता एवं नागरिक उद्देश्य यही कहते हैं कि जगकर हमें अपने दिव्यदृष्टाओं के दूरदर्शिता का अनुकरण करते हुये अपनी सहभागिता को संज्ञान में लेकर अपने महापुरुषों के सपनों का भारत बनाना होगा।

बहुत सुंदर लेख है भाई साहब
ReplyDeleteधन्यवाद 🙏
Delete