मानवता : एक ह्रासप्राय धरोहर
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। अच्छे-बुरे समाजिक संस्कारों का मानव स्वयं ही रचयिता, पूरक व भोगी भी होता है। नीति निर्धारण से लेकर कालजयी परम्पराओं तक, हारों के चिरपरिचित भावों से विश्वविजय की संकल्पनाओं तक, हर एक कार्य के आरम्भ से लेकर उनकी पूर्ति तक, मानव सिर्फ मानव का ही नही वरन् समस्त चराचर का अध्ययन कर लेता है।
कभी विचारों की उत्कृष्टता का प्रमाण वह जैव-अभ्यारण बनाकर देता है तो कभी अपनी कुटिलता, शिकार को मनोरंजन बनाकर प्रदर्शित करने में करता है। छोटे से भी छोटा काम बड़ी बुद्धिमानी के साथ, साख को ध्यान में रखकर करता है। मृगतृष्णा तो अजेय है इसकी। आपसी सहचर्य को भी बंधनों में बाँधकर रखने की चेष्टा काफी हद की है इसने।
आज जबकि समस्त लोक में इससे उत्कृष्ट कोई जीव नहीं, तो भी यह अपनी मर्यादा की सीमारेखा खींचने में असमर्थ ही है। हर एक कार्य़ कर लेने की होड़ में जीवन समर हो चुका है। अपने-पराये जो स्वयं इसके परिभाषी हुआ करते थे आज बाधक हैं। बाधक हैं उनसे आगे की सोच रखने में, अपने मुख्य धर्म मानवता के सृजन, पालन, संवहन में साथ ही साथ परिचायक में भी।
मानवता, सर्वधर्म समभाव, आत्मपरिचायक कालश्रेष्ठ विचार जैसे शब्द अपनी भावकुशलता खो रहे हैं। विचारों की सरगर्मियाँ सिर्फ स्वहित साधने की एक कला बन चुकी है... ऐसे में यदि पूर्वविचारों का अन्वेशण, संकलन एवं अनुप्रयोग ना किया गया तो भाव अपनी एकात्मकता खो देगें, मानवता जीर्ण होती चली जायेगी जो नितांत रूप से हमारे विकास का नहीं बल्कि पतन का परिचायक होगा।
बदलाव से डर ना कल था ना आज है लेकिन बदलाव संरचनात्मक हो। एक चरम बिन्दु पर आकर सभ्यतायें पराभव को प्राप्त होती हैं... हों भी परन्तु परिणाम लोककल्याणकारी हों। यहाँ प्रश्न उठता है कि सभ्यता का पराभव वह भी विकसित सभ्यता का, लोककल्याणकारी कैसे हो सकता है? क्यों नहीं हो सकता बस दृष्टिकोण होता है।
बेशक अपनी सभ्यता विकसित कह लें हम परन्तु जबतक सर्वहित साध नहीं लेते सारी साधनायें, यत्न, विचार बेकार के प्रयास मात्र होते हैं। प्रयास होते आये हैं, होते रहेंगे। विचारों की कड़ियाँ सँजोकर, एक चिरअविनाशी स्वरूप का आत्मचिंतन करते हुये, परिणामों से परे कुशल कार्य जो सर्वजनहितकारी हो की आवश्यकता है। आवश्यकताओं पर खरा उतरना हमारी प्रासंगिता को स्पष्टीकृत करता है। मानवता हमारी पहचान बने ऐसी सभ्यता का पोषण नितांत आवश्यक है।

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